जिंदगी गुजारनी थी सो गुज़र की है
ये न पूछो किस तरह से बसर की है
घायल हैं सभी पर बताता नहीं कोई
पत्थरों को तलाश किसके सर की है
छप्पर जले तो महल भी नहीं बचेंगे
आग कब देखती है हवा किधर की है
रिश्तों की मौत पर अब रोता है कौन
हर आँगन के बीच दीवार घर की है
चूड़ियों के टकराव से टूटे हैं भाईचारे
बर्तनों की खनक तो रौनक घर की है
जिधर देखा, हैं आँसू आहें और कराहें
हम कैसे कहें ये दुनिया पत्थर की है
जहाँ पर शुरू, वहीं आखिर है आलम
बूँद से है समंदर तो बूँद समंदर की है
(रफत आलम)

