कमजोरों की भाषा

मानवता, न्याय, स्वतंत्रता
कमजोर लोगों की भाषा के शब्द हैं
बलवान केवल आदेश देते हैं
जिनकी पालना में लाखों बार
समय पुस्तक के पन्ने
आदमी के लहू से बदरंग हुए हैं।

खुदा की कहलाने वाली दुनिया
गिरवी रही है
कालखण्डों में बरसों
रावणों, नमरुदों, चंगेजों, हिटलरों, योरपियनों
के हाथों।

एक बड़ा दुशमन और है आदमी का
मज़हब, जिसके नाम पर
क्रूसेडों- जिहादों– धर्मयुद्दों- दंगों में
इतने इंसान मरे हैं के उसके सामने
तमाम विश्वयुद्धों का संहार शरमा जाए।

धर्म तो सभी प्रेम पर आधारित हैं
पर अँधकार डूबी नफरत के दंभ ने
जारी किये
मंसूर-सरमद जैसों की मौत के फतवे
वे खुदा के प्रेम में थे दीवाने
ताज-तख़्त के आगे झुकते कैसे?

सूली साथ लेकर चलने वालों का सफर
अभी भी खत्म कहाँ हुआ है?
माना ज़ुल्म-हिंसा का जीवन लंबा नहीं
किसे याद आते हैं लहू से नहाने वाले?
आते हैं भी तों दुत्कारों के साथ।

हाँ, सच की आबरू रखने के लिए
ज़हर के प्याले पीने वाले अमर हो गये
फिर भी ये कहना ठीक नहीं के
पापियों ने किये की सज़ा पाई है सदा।

माना आये मानवता के उद्धारक
फिर भी ज़ुल्म की फ़ितरत कब बदली
बारूद के ढेर फट रहे हैं
अब भी अस्पतालों–प्रसूतिग्रहों पर।

ये न कहना मौत तो आनी ही थी
हाँ, आनी थी
परन्तु
अकाल म्रत्यु का दर्द
बच गयों ने कैसे सहा है
तुमने देखी नहीं क्या?
रोती-पुकारती सिसकियाँ,
बिलख-बिलख कर मनाते लोग
हादसों में मरने वालों की बरसियाँ
ताकतवर महल कभी नहीं रोते
न तीन हजार बेगुनाहों के मरने पर
न दस लाख मासूमों को मारने
के पश्चाताप में।

ताकत का एक आदेश और
शहर के शहर
आग के गोले बन जाते हैं
मानवता को स्वाह कर
विजयी सेनाओं की जीत का जश्न
विजितों की लाशों के ढेर के आगे
मनता है।

स्वतंत्रता के नाम पर कत्ले आम को
राक्षसी शासन के अंत
कहा जाता है
आज़ादी के बहाने
कर्महीन कौमों की बेडियां
ऐसे काटी जाती है के
पाँव ही नही बचते।

भोले देशों के मूल निवासी
कभी सोने-चांदी-रत्नों को लूटने के लिए
कहीं प्राक्रतिक सम्पदा पर कब्ज़े के लिए
गुलाम बने बेगार की चक्कियों में
पिसे जाते हैं,
मिट जाते हैं धरती के नक़्शे से।

आज भी ताकत का वही आदेश
कभी आतंककारियों के बमों में ढ़ल कर
कभी आतंक-उद्धारकों के हमले बन कर
कमज़ोर, बेगुनाह, बेबस मानवता के
दुश्मन बने हुए हैं।

भारी सांसत में हैं,
इन दिनों बाशिंदे
अय्याश शाहों की धरती के
जान पर आफत हुए तेल के कुँए
काला सोना हथियाने की साज़िश में
बेमौत मारे जा रहे हैं बेचारे।

वक्त के नए खुदाओं का हुक्म जारी है
न्यू वर्ल्ड आर्डर की तैयारी है
मानवता, न्याय, स्वतंत्रता,
कमजोर लोगों की भाषा के शब्द हैं।

(रफत आलम)

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