मैं तिल हूँ
नन्हा सा
सलोने गाल की
सुंदरता बना
खुश हूँ अपार।
तू ताड़ है
ऊँचा सा
सूरज सिर पर रखे
धूप में खड़ा,
कैसा है यार?
(रफत आलम)
Life creates Art and Art reciprocates by refining the Life
हर कोई कला को समझना चाहता है। चिड़िया के गाये गीत को समझने की चेष्टा क्यों नहीं करते? पेंटिंग के मामले में लोगों को समझना होता है... पर क्यों?
वे लोग जो चित्रों की व्याख्या करना चाहते हैं सरासर गलती पर होते हैं।
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मैं तिल हूँ
नन्हा सा
सलोने गाल की
सुंदरता बना
खुश हूँ अपार।
तू ताड़ है
ऊँचा सा
सूरज सिर पर रखे
धूप में खड़ा,
कैसा है यार?
(रफत आलम)
Posted on सितम्बर 17, 2011 at 9:41 पूर्वाह्न in कविता, रचनाकार, रफत आलम | RSS feed | Respond | Trackback URL