Archive for सितम्बर, 2011

सितम्बर 30, 2011

सब बेकार की बातें हैं

आदमी की कीमत नहीं मानव अंगों का बाज़ार है बड़ा
रहम-करम, दया-करुणा, शराफत सब बेकार की बातें हैं

आत्महत्या करने पर मजबूर है बेबस सर्वहारा आदमी
ईमानदारी, इन्साफ, इंसानियत सब बेकार की बातें हैं

शहर में आजकल फैशन है दो रातें लिवइन रिश्तों का
इश्क, प्रीत–प्रेम, प्यार, मोहब्बत सब बेकार की बातें हैं

खूनेदिल का लिखा रद्दीभाव, सरकारी चालीसे चलते हैं
गद्य, कविता, समीक्षा, ज़हानत सब बेकार की बातें हैं

झूठ को सौ बार बोल कर सच बनाने वाले का दौर है
सत्य, यथार्थ, सच्चाई, हकीक़त सब बेकार की बातें हैं

सकून की ज़रूरत कहाँ तनाव पालने वाली बस्ती को
सूफी–दरबार, आध्यात्मिक-संगत सब बेकार की बातें हैं

ज़हानत – बुद्धिजीविता

(रफत आलम)

सितम्बर 29, 2011

संभाल लो विरासत

 

भारी है कलम का बोझ
कांपती उंगलियां
निद्रा खो चुकी आँखों में
कोई सपना भी नहीं बाकी
जिससे
साकार कर सके कविता
इससे पहले कि मैं सो जाऊँ
इससे पहले कि कलम छुट जाए
टूट जाए मुझसे
जाग्रत ज़हनो, नवोदित विचारों
लो, संभालो इसे

(रफत आलम)

सितम्बर 27, 2011

दूर और कुछ जाना है

साथ तुम्हारे ही चलकर के दूर और कुछ जाना है
पथ से है पहचान तुम्हारी पथ मेरा अंजाना है
चिर परिचित से मुझे लगे हो
शायद जन्मों साथ रहे हो
या फिर कोई और बात है
सुख-दुख जो तुम साथ सहे हो
मुझको तो ऐसा लगता है मन जाना-पहचाना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
मिलना और झगड़ना मिलकर
यह तो अपनी आम बात है
जीत मिली है हरदम तुमको
मुझको तो बस मिली मात है
सारी उम्र मुझे तो शायद हरदम तुम्हे मनाना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
जब-जब भी मिल जाते हो तुम
मन पर चाँद उतर आता है
दूर तुम्हारे होते ही पर
सुख जैसे सब छिन जाता है
बहुत रोकता हूँ मैं आँसू पर वह तो बाहर आना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
अपने पीछे था कल बचपन
आज द्वार पर आया यौवन
कल तक कोई रोक नहीं थी
आज लग गये मन पर बंधन
इनसे डरकर मेरे मन अब और नहीं घबराना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
प्रेम हमारा दीया-बाती
या फिर है चातक-स्वाति
निस दिन इसको बढ़ना ही है
जैसे नदिया चलती जाती
हमको भी तो मंजिल अपनी आज नहीं कल पाना है
पथ से है पहचान तुम्हारी…

{कृष्ण बिहारी}

सितम्बर 26, 2011

शोषितों कल का उजाला तुम्हारा

ज़ुल्म की काली घटाओं के पीछे
बंधक है
न्याय-समता-समानता का सूरज।

अश्रु पीने को मजबूर हैं
प्यासे किसान,
मेहनतकश मजदूर हैं भूखे।

रौशनी जागीर बनी
खेतों की लाशों पर उग आये
महलों की।

भूख से मौत,
क़र्ज़दार किसानो की खुद्कुशी
विरासत है फैले दामनों की।

मुफलिसी के पावों में
ज़ुल्मत की ज़ंजीर हैं
अंधेरा गरीब की तकदीर है।

ऐसे क्रंदनमय माहौल में
घोर तम के पीछे से
यहाँ वहाँ कुछ रोशन किरणे,
झिलमिला उठी हैं
झोपडों के टूटे छप्परों पर।

इन्ही नन्हे प्रकाश पुंजों में
कोई सूरज बनकर जागेगा
पस्त-त्रस्त-शोषित लोगों
कल उजाला तुम्हारा होगा।

(रफत आलम)

सितम्बर 25, 2011

शाह या फकीर, मरना दोनों को है

गुलेल की जिद है देखे, कहाँ तक पत्थर जाता है
उसे कौन समझाए घरों का शीशा बिखर जाता है

शाम ढले जब पंछी भी नीड़ों को लौटने लगते हैं
एक शख्स घर से निकल के जाने किधर जाता है

मेरी प्यास किसी निगाहें करम की मोहताज नहीं
इस फकीर का प्याला तो खुद से भी भर जाता है

यही मजबूरी तो है जिंदगी की सबसे बड़ी मजबूरी
शाह हो के फकीर आखिर में आदमी मर जाता है

उजाले के तलाशी पाँव के इन छालों से डर कैसा
दीपक से सूरज तक लपटों का रहगुज़र जाता है

ताज बने कि मशीने चले जीवन भूखों के रोते हैं
हाथ नहीं जाते आलम, इस दौर में हुनर जाता है

(रफत आलम)

सितम्बर 24, 2011

पायरेटेड वर्ज़न हूँ मित्र, चाहो तो डिलीट कर दो


मुझे वहम है मित्र
कि तुम्हे मुझसे परहेज़ है
शायद डर है तुम्हे
मेरे नाम का वायरस
तुम्हारे कम्प्यूटर को
हैंग कर देगा।

एक गुमान
अपने बारे में भी है
कि मैं सच का उपासक हूँ
गुमान–वहम
पागलों को होते हैं
तुम्हारा यकीन
असल सच है

मैं झूंठा–मक्कार-कुंठित
असल का मुखौटा ओढ़े
पाइरेटेड सॉफ्टवेयर हूँ
स्पैम घोषित कर
डिलीट कर दो।

(रफत आलम)

सितम्बर 23, 2011

बूँद और समंदर

 

जिंदगी गुजारनी थी सो गुज़र की है
ये न पूछो किस तरह से बसर की है

घायल हैं सभी पर बताता नहीं कोई
पत्थरों को तलाश किसके सर की है

छप्पर जले तो महल भी नहीं बचेंगे
आग कब देखती है हवा किधर की है

रिश्तों की मौत पर अब रोता है कौन
हर आँगन के बीच दीवार घर की है

चूड़ियों के टकराव से टूटे हैं भाईचारे
बर्तनों की खनक तो रौनक घर की है

जिधर देखा, हैं आँसू आहें और कराहें
हम कैसे कहें ये दुनिया पत्थर की है

जहाँ पर शुरू, वहीं आखिर है आलम
बूँद से है समंदर तो बूँद समंदर की है

(रफत आलम)

सितम्बर 22, 2011

खुदकशी – मर्ज़ और दवा

बिखरे हुए सपने अपनी जिंदगी से गए
बूढ़े कुछ चश्मे आँख की रोशनी से गए
झुका हुआ एक दरख्त ठूंठ हुआ बेचारा
बेरुते फल थे टूट कर खुद-खुशी से गए

दुःख को साथी मानते कट जाता दुःख
कबीर-गालिब को पढ़ते बट जाता दुःख
तुम मोल तो करते अमूल्य जीवन का
बिन अश्रु आँखों में सिमट जाता दुःख

जलते दीपक से सीख जीने का करीना
दुनिया के आगे हँसना पीछे अश्रु पीना
सोच ये हो तेरे साथ बिताये पल जीलूँ
ये सोच गलत है तेरे बिना क्या जीना

टूटे आस तो खुदा का आसरा है बहुत
हो भरोसा तो स्वयं का सहारा है बहुत
सपनों के साथ आँखे नहीं मरा करती
देख तो सही आगे अभी रास्ता है बहुत

नफा-नुकसान, दुख-सुख, मिलना–बिछड़ना
अनुभव है जिंदगी के, इनसे सीख समझ
समय का शिकारी तो खुद तेरी टोह में है
उसके जाल में न आ, फंदों में न उलझ

(प्रेम में असफलता पाने से की गई आत्महत्या की खबर से जन्मा ख्याल)

(रफत आलम)

सितम्बर 20, 2011

कमजोरों की भाषा

मानवता, न्याय, स्वतंत्रता
कमजोर लोगों की भाषा के शब्द हैं
बलवान केवल आदेश देते हैं
जिनकी पालना में लाखों बार
समय पुस्तक के पन्ने
आदमी के लहू से बदरंग हुए हैं।

खुदा की कहलाने वाली दुनिया
गिरवी रही है
कालखण्डों में बरसों
रावणों, नमरुदों, चंगेजों, हिटलरों, योरपियनों
के हाथों।

एक बड़ा दुशमन और है आदमी का
मज़हब, जिसके नाम पर
क्रूसेडों- जिहादों– धर्मयुद्दों- दंगों में
इतने इंसान मरे हैं के उसके सामने
तमाम विश्वयुद्धों का संहार शरमा जाए।

धर्म तो सभी प्रेम पर आधारित हैं
पर अँधकार डूबी नफरत के दंभ ने
जारी किये
मंसूर-सरमद जैसों की मौत के फतवे
वे खुदा के प्रेम में थे दीवाने
ताज-तख़्त के आगे झुकते कैसे?

सूली साथ लेकर चलने वालों का सफर
अभी भी खत्म कहाँ हुआ है?
माना ज़ुल्म-हिंसा का जीवन लंबा नहीं
किसे याद आते हैं लहू से नहाने वाले?
आते हैं भी तों दुत्कारों के साथ।

हाँ, सच की आबरू रखने के लिए
ज़हर के प्याले पीने वाले अमर हो गये
फिर भी ये कहना ठीक नहीं के
पापियों ने किये की सज़ा पाई है सदा।

माना आये मानवता के उद्धारक
फिर भी ज़ुल्म की फ़ितरत कब बदली
बारूद के ढेर फट रहे हैं
अब भी अस्पतालों–प्रसूतिग्रहों पर।

ये न कहना मौत तो आनी ही थी
हाँ, आनी थी
परन्तु
अकाल म्रत्यु का दर्द
बच गयों ने कैसे सहा है
तुमने देखी नहीं क्या?
रोती-पुकारती सिसकियाँ,
बिलख-बिलख कर मनाते लोग
हादसों में मरने वालों की बरसियाँ
ताकतवर महल कभी नहीं रोते
न तीन हजार बेगुनाहों के मरने पर
न दस लाख मासूमों को मारने
के पश्चाताप में।

ताकत का एक आदेश और
शहर के शहर
आग के गोले बन जाते हैं
मानवता को स्वाह कर
विजयी सेनाओं की जीत का जश्न
विजितों की लाशों के ढेर के आगे
मनता है।

स्वतंत्रता के नाम पर कत्ले आम को
राक्षसी शासन के अंत
कहा जाता है
आज़ादी के बहाने
कर्महीन कौमों की बेडियां
ऐसे काटी जाती है के
पाँव ही नही बचते।

भोले देशों के मूल निवासी
कभी सोने-चांदी-रत्नों को लूटने के लिए
कहीं प्राक्रतिक सम्पदा पर कब्ज़े के लिए
गुलाम बने बेगार की चक्कियों में
पिसे जाते हैं,
मिट जाते हैं धरती के नक़्शे से।

आज भी ताकत का वही आदेश
कभी आतंककारियों के बमों में ढ़ल कर
कभी आतंक-उद्धारकों के हमले बन कर
कमज़ोर, बेगुनाह, बेबस मानवता के
दुश्मन बने हुए हैं।

भारी सांसत में हैं,
इन दिनों बाशिंदे
अय्याश शाहों की धरती के
जान पर आफत हुए तेल के कुँए
काला सोना हथियाने की साज़िश में
बेमौत मारे जा रहे हैं बेचारे।

वक्त के नए खुदाओं का हुक्म जारी है
न्यू वर्ल्ड आर्डर की तैयारी है
मानवता, न्याय, स्वतंत्रता,
कमजोर लोगों की भाषा के शब्द हैं।

(रफत आलम)

सितम्बर 19, 2011

तुम बताओ साँस थम न जायेगी

काली रात के काले अंधेरे में
तुम्हारे रुप का उजला उजाला
जब भी मेरे सामने होगा कभी
तुम बताओ नींद कैसे आयेगी!

मृगनयनी तुम्हारी आँख का दर्पण
कोटरों में कैद करके यदि तुम्हे
केवल तुम्हारी प्यास दिखलाये
तुम बताओ प्यास बढ़ न जायेगी!

सोई धूप के नीले समंदर में
धुली कविता-सा तुम्हारा विम्ब तैरे
और लहरों पर मचल जाये अगर
तुम बताओ लहर क्यों न गायेगी?

मेरे हृदय के हर खुले आकाश पर
सोना तुम्हारे रंग का सौदामिनी
पिघलकर शर्म से कभी पागल बने
तुम बताओ साँस थम न जायेगी!

{कृष्ण बिहारी}

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