भ्रष्टाचार और दोहरे चरित्र का द्वन्द

भ्रष्टाचार के विरुद्ध
बहती हुयी गंगा में
आज हर कोई
हाथ धोने के लिए तत्पर है
केवल यह दिखाने के लिए कि
वह कितना संजीदा है और
कितना बड़ा देशभक्त है
जो खुलकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध
नारेबाजी, धरने, प्रदर्शन कर रहा है
हो सकता है कुछ लोग
इस उद्देश्य के प्रति
ईमानदार नियत और समर्पण रखते हों
और यह भी ठीक है कि
लोकतंत्र में जनहित के मुद्दों पर
लोग जागरूक हों
तभी तो लोकतंत्र बेहतरी की राह पर
आगे बढ़ सकता है
लेकिन यह भी तो
सबसे बड़ा सच है कि
भ्रष्टाचार यानि भ्रष्ट आचरण
जिसका सन्दर्भ यहां
गलत तरीको से
कमाए जाने वाले धन-दौलत से
लिया जा रहा है
वह बुरायी का एक पहलू है
जिसका मूल लालच है
और यदि बीमारी का इलाज
खोजना हो तो उसके मूल
यानि जड़ को पकड़ना जरूरी है
और अब प्रश्न यह कि
बुरायी क्या कभी खत्म हुयी है
या फिर बुरायी पर कभी
ऐसा अंकुश लगा है कि
उसका प्रभाव ही न हो
कभी नहीं
जब से मानवता का इतिहास
जाना जा सकता है
तबसे बुरायी और अच्छाई दोनों
इस तरह विद्यमान रही है
जैसे फूलों के साथ
कांटे भी विद्यमान रहतें हैं
इन्सान की प्रकृति में
तीन गुण-सत्व, रजस, और तमस रहतें हैं
जिनके अंशो के आधार पर ही
एक व्यक्ति में अच्छाई
दूसरे में बुरायी और
तीसरे में अच्छाई और बुरायी दोनों का मिश्रण
अधिक पाया जाता है
और इसके अनुसार ही उनका कार्य भी
इसलिए
भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने के लिए
तत्पर हर व्यक्ति को
अपनी आत्मा के प्रति
होना होगा जवाबदेह
कि वह लालची कर्म प्रवृत नहीं
और यदि जवाब न दे सके तो
इस लड़ाई लड़ने से पहले
उसे करनी होगी
अपने कर्म की शुद्धता से
अन्तःकरण की शुद्धि
क्योंकि ज़ाहिर है कि
नकली मुखौटा जल्दी ही उतरकर
व्यक्ति का असली चेहरा
हो जाता है बेनकाब
और यह तय है कि
दोहरे चरित्र के द्वन्द से
लड़ रहा व्यक्ति
जब स्वयं से ही न जीत पाए तो
वह किसी भी क्रन्तिकारी युद्ध में
समर्पित और विजयी योद्धा कैसे हो सकता है !

(अश्विनी रमेश)

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10 टिप्पणियाँ to “भ्रष्टाचार और दोहरे चरित्र का द्वन्द”

  1. सार्थक एवं वास्तविकता से परिचय कराती हुई रचना पढ़ कर बहुत अच्छा लगा…

  2. इन्दु जी,

    टिप्पणी हेतु हार्दिक धन्यवाद और आभार !

  3. apni parchai koi nahin dekhta sir ji.

  4. आत्म निरीक्षण जरूरी है !

  5. व्यक्त्ति का अंदर से बदलना तो मुख्य बात है। पर हमेशा ऐसा जरुरी नहीं कि इस बदलाव के इंतजार में बैठा रहा जाये। एक व्यक्ति के लिये इंतजार उचित हो सकता है, एक देश के लिये, एक काल के लिये नहीं।
    आत्मनिरीक्षण, आत्मपरीक्षण तो ताउम्र चलने वाली प्रक्रियायें हैं, यहाँ तक चेतन बुद्ध पुरुष (नारी) भी इनसे अछूते रहते नहीं दिखते अगर वे सांसारिक गतिविधियों से सम्बंधित हो रहे हैं।
    पर इस चेतना के आने तक सामजिक चेतना का काम इस नाते तो नहीं रोका जा सकता कि पहले पूर्णतया नहा कर शुद्ध हो लो तब कुछ कहने/करने की बात होगी। हर काल में हर देश में ऐसे लोगों की भीड़ रहती है जो उसका पालन करते हैं जो वर्तमान में चल रहा हो। कल अगर वे अंदर से ईमानदार भी थे पर अगर चारों तरफ भ्रष्टाचार फैल रहा है और भ्रष्टाचारी शक्तिशाली हो रहे हैं तो वे भले ही पसंद न करें पर वे उन रास्तों को अपना लेंगे जो चल रहे हैं। उसी तरह ऐसे भी हैं जो कल तक भ्रष्ट रास्ते पर चले रहे थे क्योंकि माहौल ऐसा था कि सबको लगता था सब चल रहे हैं पर अगर ईमानदारी का सिक्का चल निकले तो वे इस मुद्रा को अपना लेंगे। वे अच्छे के रास्ते में अड़ंगा नहीं लगायेंगे।
    हर जगह अध्यात्म एलोपैथी की तरह काम नहीं कर सकता। यह धीमी प्रक्रिया है। फिर वहाँ भी ऐसे उदाहरण हैं कि मरा मरा का जाप राम राम हो गया।
    जो कल तक मरा मरा जप रहे थे, उनके बारे में आशा क्यों न की जाये कि वे राम राम जप की ओर ही बढ़ रहे हैं?

  6. राकेश जी,

    यह तो आपकी सोच का एक पहलू है ! एक सशक्त पहलू यह है कि केवल व्यक्ति का अस्तित्व है, समाज मात्र एक कल्पना है! एक या एक से अधिक व्यक्ति जब अपनी किसी मनोवैज्ञानिक अथवा शारीरिक आवश्यकताओं के लिए अस्थायी अथवा दीर्घकालिक सबंध बनाते हैं तो उसे ही हम समाज का नाम दे देते हैं,!जब आपको दर्द होता है तो आपकी पत्नी या बच्चे भी उसके भागीदार नहीं हो सकते ! कहने का अर्थ यह कि सुख है तब भी आपको अकेले झेलना है और दुःख अथवा कष्ट भी आपको अकेले ही झेलना है ! अकेले हीआप पैदा हुए और अकेले ही आपको मरना है ! आपको अपने प्रत्येक कर्म का फल सुख या दुःख के रुप में अकेले ही झेलना है ! इसलिए असिस्त्व समाज का नहीं व्यक्ति का है !उदाहरण स्वरुप आपके परिवार में सबकी सोच अपनी है, सबका कर्म अपना है ! और यदि आपके परिवार में ही कोई बुरा कार्य करना शुरू कर दे तो क्या आप उसे सुधार पाएंगे ! कभी नहीं ! क्योंकि वह तब तक नहीं सुधरेगा जब तक उसकी चेतना जागृत न हो और चेतना जागरण ऐसे नहीं होता उसके लिए सत्कर्म और कष्टों से गुज़रना पड़ता है ! अतः यह केवल भ्रम है कि हम समाज को बदल सकतें हैं ! यदि ऐसा होता तो महात्मा बुद्ध जैसे व्यक्तियों के बाद तो समाज सुधर जाना चाहिए था परन्तु यह तो उससे भी नीचे गिर गया जितना उनके समय में था ! यह सब कहने का बड़ा स्पष्ट अर्थ है कि भ्रष्टाचार बुरायी का एक पहलू है और बुरायी और अच्छाई हमेशा रही है और रहेगी ! इसलिए एक व्यक्ति में जब चेतना आती है तो ही वह दूसरे व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के लिए अच्छा साबित हो सकता है अन्यथा नहीं ! इसलिए व्यक्ति कर्मशोधन और चेतना ही अच्छाई का कारण हो सकता है !इसलिए कुछ दिनों भीड़ के इक्कठे होने से क्या फर्क पड़ता है, जब तक एक व्यक्ति अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अपने कर्म को शुद्ध नहीं करता ! भीड़ तो कुछ दिनों इक्कठी हो सकती है लेकिन जीवन तो रोज चलना है और अच्छाई , बुरायी से भी रोज रूबरू होना पड़ेगा ! अधिक स्पष्टता के लिए आप मेरा लेख –“सामाजिक परिवर्तन की भ्रममूलक भूल आखिर क्योँ कर बैठतें हैं चिंतनशील लोग ” पढें——http://ashwinirameshkundli.wordpress.com पर !

  7. Fantastic work sir ….!!!!
    -a student of class 10

  8. किसी भी समाज में 10% लोग ईमानदार होते हैं कैसी भी व्यव्स्था हो वह ईमानदार ही रहता है, 10% बेईमान होते हैं पक्के बेईमान, कभी न सुधरने वाले बेईमान ! बाकी 80% न ईमानदार होते हैं न बेईमान वो अगर व्यव्स्था ईमानदार होती है तो ईमानदार होते हैं व्यव्स्था बेईमान होती है तो वो बेईमान हो जाते हैं! (ये वही लोग होतें हैं जो सिंगापुर जाने पर पान की पीक सड़क पर नहीं फेकते बल्कि गटक जाते हैं। अमेरिका जाकर अपना टैक्स सही तरह से देने लगते हैं)….
    जनलोकपाल बिल इन्हीं 80% लोगों के लिये है!!

  9. सचिन,

    तुम जीवन को समझने का प्रयास कर रहे हो यही बड़ी बात है ! बात जनलोकपाल की नहीं, हमारे चरित्र में गिरावट की है ! कानून कोई जादू की छड़ी नहीं,जो सब ठीक कर दे !अभी भी तो कितने कानून है,लेकिन उसको लागू करने वाले तो वही लोग हैं फिर ढाक के वही तीन पात !उपभोक्तावाद आज के युग की सबसे बड़ी चुनोती है जो भ्रष्टाचार को हवा दे रही है !खैर कुछ ही दिन बाद मेरी अगली कविता पढना तुम्हे सब कुछ आईने की तरह स्पष्ट हो जाएगा !

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