पुरातन उसूल परदे में बिठा देते हैं तुझे
बंद कमरों की कैद में छुपा देते हैं तुझे
अति इन हालात की जान पर आफत है
नवीन संस्कार “लिव इन” बना देते हैं तुझे
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शोहदों की फब्तियों से किरच किरच बिखर जाती है सहमी हुई लड़की
गूंगी बहरी और अंधी बन के राह से गुज़र जाती है सहमी हुई लड़की
सर झुका के चलने की नसीहतों ने बहुत ज़ुल्म ढाया है इस अबला पर
कई बार तो चलते में अपने ही साये से डर जाती है सहमी हुई लड़की
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मीठे गोश्त के शिकारी घात लगा रहे हैं
कहीं दहेज के लालची आँखे दिखा रहे हैं
बहुत भारी है जवान होती बेटी का बोझ
मुफलिस बाप के कांधे झुकते जा रहे हैं
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आज के दौर से नज़रें मिला के चल
नीची निगाह वाली सर उठा के चल
तुझ से है ज़माना तू ज़माने से नहीं
जननी, जननों से कदम मिला के चल
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बड़ा है तेरा मुकाम नारी तू मादर ए दुनिया है
चूड़ियों की कैद ने तुझको अबला बना दिया है
“ज़ीरो फीगर” से सबक न ले खुद को पहचान
हव्वा तू, दुर्गा तू, सीता तू, मरियम तू, तू जुलेखा है।
(रफत आलम)


