न परदा न जीरो फीगर है तेरी हस्ती

पुरातन उसूल परदे में बिठा देते हैं तुझे
बंद कमरों की कैद में छुपा देते हैं तुझे
अति इन हालात की जान पर आफत है
नवीन संस्कार “लिव इन” बना देते हैं तुझे
………..

शोहदों की फब्तियों से किरच किरच बिखर जाती है सहमी हुई लड़की
गूंगी बहरी और अंधी बन के राह से गुज़र जाती है सहमी हुई लड़की
सर झुका के चलने की नसीहतों ने बहुत ज़ुल्म ढाया है इस अबला पर
कई बार तो चलते में अपने ही साये से डर जाती है सहमी हुई लड़की
………….

मीठे गोश्त के शिकारी घात लगा रहे हैं
कहीं दहेज के लालची आँखे दिखा रहे हैं
बहुत भारी है जवान होती बेटी का बोझ
मुफलिस बाप के कांधे झुकते जा रहे हैं
…………

आज के दौर से नज़रें मिला के चल
नीची निगाह वाली सर उठा के चल
तुझ से है ज़माना तू ज़माने से नहीं
जननी, जननों से कदम मिला के चल
…………

बड़ा है तेरा मुकाम नारी तू मादर ए दुनिया है
चूड़ियों की कैद ने तुझको अबला बना दिया है
“ज़ीरो फीगर” से सबक न ले खुद को पहचान
हव्वा तू, दुर्गा तू, सीता तू, मरियम तू, तू जुलेखा है।

(रफत आलम)

6s टिप्पणियाँ to “न परदा न जीरो फीगर है तेरी हस्ती”

  1. बहुत भारी है जवान होती बेटी का बोझ
    मुफलिस बाप के कांधे झुकते जा रहे हैं
    संवेदनशील रचना , कुछ सवालों का उत्तर दे रही है अच्छी लगी, बधाई

  2. सुनील कुमार जी बहुत धन्यवाद आपने नाचीज़ के लिखे को ध्यान में लिया

  3. इतिहास ऐसी सीख देता है कि सामान्यतः नारी भी पुरुष के समान बस ही सामान्य है। उसे अर्श या फर्श – दो ही स्थितियों में रखने की कोशिश ने उसका और हरेक काल में सभ्यताओं बड़ा नुकसान किया है।
    वह भी उतनी ही महान, अच्छी, साधारण या औसत, और बुरी हो सकती है और होती है जितना कि पुरुष हो सकता है या होता है। न वह पुरुष से कम है न ज्यादा। न महान न तुच्छ। कुछ मामलों में स्त्री पुरुष पूरक हैं और बाकी में समान।

  4. जनाब जाकिर अली साहिब बहुत शुक्रिया

  5. जनाब राकेश साहिब सही फरमाया नाचीज़ की सोच भी पंक्तियाँ लिखते समय यही थी .

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