कई बार यूँ ही
ज़हन में बनते है संवाद ….
कैसे हो?
तुम्हारे सामने हूँ
क्या हालत बना रखी है?
अच्छा हूँ
फिर पी रखी है?
तुम्हे भुलाने के लिए
क्या भूल गये?
खुद को भूल गया हूँ
पागल हो!
वक्त के गुबार में
वह छिप जाती है
आकाश परे जाकर
और मैं
मैं अब भी जिंदा हूँ|
(रफत आलम)

