जो मरा क्यों मरा
जो लुटा क्यों लुटा
जो हुआ क्यों हुआ…
मुद्दतों से हैं गुम
इन सवालों के हल
जो हुआ सो हुआ …
मंदिरों में भजन,
मस्जिदों में अजान
आदमी है कहाँ,
आदमी के लिये
एक ताजा ग़ज़ल
जो हुआ सो हुआ…
(निदा फाज़ली)
Life creates Art and Art reciprocates by refining the Life
हर कोई कला को समझना चाहता है। चिड़िया के गाये गीत को समझने की चेष्टा क्यों नहीं करते? पेंटिंग के मामले में लोगों को समझना होता है... पर क्यों?
वे लोग जो चित्रों की व्याख्या करना चाहते हैं सरासर गलती पर होते हैं।
| Bakul Dhruva on मुझे ना ढूंढ! | |
| Bakul Dhruva on मूर्त होता प्रेम! | |
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जो मरा क्यों मरा
जो लुटा क्यों लुटा
जो हुआ क्यों हुआ…
मुद्दतों से हैं गुम
इन सवालों के हल
जो हुआ सो हुआ …
मंदिरों में भजन,
मस्जिदों में अजान
आदमी है कहाँ,
आदमी के लिये
एक ताजा ग़ज़ल
जो हुआ सो हुआ…
(निदा फाज़ली)
Posted on सितम्बर 29, 2010 at 10:23 अपराह्न in कविता, ग़ज़ल | RSS feed | Respond | Trackback URL
मंदिरों में भजन,
मस्जिदों में अजान
आदमी है कहाँ,
आदमी के लिये
बस निदा साब का ही शेर अर्ज कर दूँ
घर से मस्जिद तो दूर है चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये