24 अक्टुबर 1995 को आये पूर्ण सूर्यग्रहण ने प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर साब का कविरुप जाग्रत कर दिया था और इन्होने इस अवसर पर निम्नांकित कविता को रचा था। आज हबीब साब को गुजरे हुये एक साल हो गया है। हबीब साब को श्रद्धांजलि उन्ही की कविता दे सकती है।
हीरे की अँगूठी
एक चमत्कार अकबरपुर में हमने भी कल देखा था।
दिन भी था और दूर- दूर तक रात भी गहरी छाई थी।
इक पल चिड़िया निकली ही थी दूसरे पल वापस आई।
सुबह के पाकिज़ा चेहरे से शाम भी लिपट आई थी।
झूम के सूरज कूद आया था चाँद की खिड़की से अंदर
और दहलीज पे तीन सितारों की इक सफ निकल आयी थी।
मेहरे आलमताब का जलवा चाँद की बाँहों में हो बंद?
जोशे फराँवा में सूरज ने गोद अपनी फैलायी थी।
बल खाते साये लपके थे जुल्फें परेशां की मानिंद।
शौक का आलमलामुत नाही बेपायां रुसवाई थी।
अर्शे बरी पर खुले आम इश्क के सब आसार नुमायां थे।
सुबह भी कुछ बहकी-बहकी थी शाम भी कुछ बौराई थी।
चाँद ने सूरज के मुखड़े पर नीला आँचल फेंका था।
सूरज ने भी बढ़के अँगूठी हीरे की पहनाई थी।
एक चमत्कार अकबरपुर में हमने भी कल देखा था।
