सूर्य गिर गया
अन्धकार में ठोकर खाकर
भीख माँगता है
कुबेर झोली फैलाकर
कण कण को मोहताज
कर्ण का देश हो गया
माँ का अँचल द्रुपद सुता
का केश हो गया
Life creates Art and Art reciprocates by refining the Life
हर कोई कला को समझना चाहता है। चिड़िया के गाये गीत को समझने की चेष्टा क्यों नहीं करते? पेंटिंग के मामले में लोगों को समझना होता है... पर क्यों?
वे लोग जो चित्रों की व्याख्या करना चाहते हैं सरासर गलती पर होते हैं।
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सूर्य गिर गया
अन्धकार में ठोकर खाकर
भीख माँगता है
कुबेर झोली फैलाकर
कण कण को मोहताज
कर्ण का देश हो गया
माँ का अँचल द्रुपद सुता
का केश हो गया
Posted on जून 2, 2010 at 10:22 अपराह्न in कविता | RSS feed | Respond | Trackback URL
बढिया रचना प्रेषित की है। आभार।
बहुत गहन रचना ..
bahut gahra vichar
Nice poetry…isi tarah aap kavitaen likhte rahiye.
अटल जी को जन्मदिन की शुभकामनायें
Unexpectedly True !!!
