श्याम, कान्हा, कृष्ण… कुछ भी कह लो उन्हे, वे जीवन के मनुष्य रुप में जन्मे विराटतम स्वरुप हैं। ऐसा प्रतीत नहीं होता कि मनुष्य रुप में जीवन इससे बड़ा हो सकता है या इससे ऊपर जा सकता है। कृष्ण जीवन का उल्लास हैं, उत्सव हैं। उन्होने सिर्फ सैधान्तिक रुप में ही जीवनदर्शन नहीं उच्चारित किया वरन हरेक बात को खुद जीकर दिखाया। गीता तो एक बहुत छोटी सी कुंजी है उस विशालतम व्यक्तित्व द्वारा दिखायी लीला के दर्शन की।
मन में गहराई से भक्तिभाव से भरे एक आस्तिक को ऐसा बता दिया जाये कि ईश्वर नहीं है तो उस “विशेष” के न होने की कल्पनामात्र से ही उसका सारा अस्तित्व काँपने लगेगा। वह अपने को इतना निरीह पायेगा जितना उसने अपने को पहले कभी नहीं पाया था। जो उसके पास था सदा, जो उसकी पूँजी था, जिसके कारण उसे ऊर्जा मिलती थी आज वह नहीं है का अहसास किसी को भी हिला कर रख देगा।
जब विराट व्यक्तित्व पास में हो, सदा सुलभ हो, सहज ही जिस तक पहुँच हो तब उस विशाल उपस्थिति से भी कुछ शिकायतें हो जाना स्वाभाविक है। मानव का स्वभाव ही कुछ ऐसा है पर अगर वही विशाल अस्तित्व यकायक जीवन का भौतिक रुप छोड़ दे और शून्य में विलीन हो जाये तो उसके आसपास रहने वालों के जीवन में एकदम से शून्य आ जाता है। उनके प्रिय की अनुपस्थिति उन्हे उनकी निर्बलता का अहसास कराने लगती है। सारे गिले शिकवे एकदम से गायब हो जाते हैं और बस एक इच्छा सारे समय चीत्कार करने लगती है कि एक बार बस एक बार उससे मिलना हो जाये।
यह कह लूँ
वह कह लूँ
गले लग जाऊँ
पैर पकड़ माफी माँग लूँ
बस एक बार और मिल जाऊँ।
उस अभाव में आँसू थमते नहीं। ऐसा तो साधारण मनुष्य के जाने से भी हो जाता है और अगर बात कृष्ण जैसे व्यक्तित्व के धरा से विलीन होने की हो तो उनके पीछे रह जाने वाले उनके प्रिय जनों की स्थितियों का सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है।
गुजराती साहित्यकार दिनकर जोशी जी ने अपने अदभुत उपन्यास “श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते” में कृष्ण के न रहने की इसी पर्वत सी ऊँची पीड़ा को दर्शाने का कठिन काम साधा है।
कृष्ण के पीछे छूट जाने वाले चरित्रों के दुख को, उनकी पुकार को शब्द देता है यह उपन्यास। अर्जुन, द्रौपदी, राधा, अश्वत्थामा, अक्रूर आदि व्यक्तियों की मनोदशा का जीवंत वर्णन करता है यह उपन्यास। यह उपन्यास पाठक को रुह की गहरायी तक भिगो जाता है।
एक अच्छी पुस्तक में उस देश में रची सब अच्छी रचनाओं का स्वाद आ जाता है। ऐसा अपने आप हो जाता है।
स्व. धर्मवीर भारती जी की कालजयी रचना अंधायुग में एक प्रसंग है जहाँ गांधारी कृष्ण को शाप देती है।
गांधारी :
तो सुनो कृष्ण
प्रभू हो या परात्पर हो
कुछ भी हो
सारा तुम्हारा वंश
इसी तरह पागल कुत्तों की तरह
एक दूसरे को फाड़ खायेगा
तुम खुद उनका विनाश करके कई वर्षों बाद
किसी घने जंगल में
साधारण व्याध के हाथों मारे जाओगे
प्रभू हो पर मारे जाओगे एक पशु की तरह
…………
कृष्ण :
माता!
प्रभू हूँ या परात्पर
पर पुत्र हूँ तुम्हारा, तुम माता हो
…..
अट्ठारह दिनों के इस भीषण संग्राम में
कोई नहीं वरन मैं ही मरा हूँ करोड़ों बार
……..
जीवन हूँ मैं तो मृत्यू भी तो मैं ही हूँ माँ
शाप तुम्हारा स्वीकार है।
एक असहनीय दुख है उपरोक्त गांधारी कृष्ण संवाद में। दुख और क्रोध से भरी गांधारी कृष्ण को शाप तो दे देती हैं परन्तु कृष्ण के इस प्रकार शाप को स्वीकार करने से स्थितियाँ एकदम से बदल जाती हैं उनके लिये और गांधारी रोने लगती हैं।
गांधारी:
यह क्या किया तुमने
रोई नहीं मैं अपने सौ पुत्रों के लिये
लेकिन कृष्ण तुम पर
मेरी ममता अगाध है
कर देते तुम शाप यह मेरा अस्वीकार
तो क्या मुझे दुख होता?
मैं थी निराश, मैं कटु थी
पुत्रहीना थी।
कृष्ण:
ऐसा मत कहो
माता!
जब तक मैं जीवित हूँ
पुत्रहीन नहीं हो तुम।
प्रभू हूँ या परात्पर
पुत्र हूँ तुम्हारा
तुम माता हो ।
जो दुख, जो भाव अंधायुग से लिये गये उपरोक्त प्रंसंग में है उसमें अगर ऐसा भी जोड़ दिया जाये कि कृष्ण वहाँ नहीं हैं और गांधारी को बाद में अपराध बोध होता है अपने द्वारा दिये गये शाप के कारण तो कृष्ण की अनुपस्थिति में गांधारी को हुयी छटपटाहट का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। गांधारी को तो साक्षात कृष्ण द्वारा ही संबल मिल गया पर बाकी चरित्र तो कृष्ण के बिना उनसे एक बार और मिलने के लिये छटपटाकर रह गये। और दिनकर जोशी जी की पुस्तक कृष्ण के पीछे छूट गये चरित्रों की विवशता का ही वर्णन करती है।
भावों को महत्व देने वाले जिस किसी भी भारतीय साहित्य प्रेमी ने इस पुस्तक को न पढ़ा हो उसके लिये इसका न पढ़ा जाना ऐसे ही है जैसे कि कोई बहुत मूल्यवान चीज थी हमारे आस पास और हम चूक गये उसके दर्शन करने से।
…[राकेश]





